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۱۱۰۲۱.

«سفر» و اهداف و آداب آن در نزد صوفیان از قرن اول تا قرن نهم ه. ق.(مقاله علمی وزارت علوم)

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سفر از سنتهای دیرینه در اندیشه صوفیانه است. با نگاهی به پیشینۀ این سنت در منابع اسلامی، در می یابیم که صوفیه برای سفرهای خود اهداف و کارکردهای خاصی قائل بودند که می‌توان بر مبنای آن سفرهای آنها را دسته‌بندی و تعریف نمود. در این مقاله با بررسی منابع اصلی صوفیه از قرن اول تا قرن نهم این اهداف و کارکردها را در دو بخش بیرونی و درونی استخراج نموده و به بررسی آدابی، ماجراها و حکایاتی پرداخته ایم که در کتب تصوف متناسب با هر یک از این انواع روایت شده است. نتیجة این پژوهش نشان می‌دهد که در طول این نه قرن سفرهای صوفیه از حیث کمیت ، کیفیت ، اهداف و کارکردها یکسان نبوده است. تلاش نمودیم صوفیان مسافر را در هر قرن معرفی و اهداف آنها را نشان دهیم و از اتفاقات خاص این سفرها که صوفیان بدان اشارت کرده اند ، یاد کنیم . روش ما در این پژوهش روش کتابخانه ای بوده است و با توجه به یافته های پژوهش می‌توان گفت که سیر آفاق در مقایسه با سیر انفس از اهمیت ثانویه برخوردار بوده و هدف اصلی از سیر آفاق نیز شناخت و تزکیة نفس یا سیر در آن بوده است.
۱۱۰۲۲.

Литературное творчество Д.И. Фонвизина в контексте русской культуры Екатерининского времени (проблемы и перспективы изучения)(مقاله علمی وزارت علوم)

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Статья посвящена анализу направлений в изучении литературного творчества Д.И. Фонвизина, сложившихся в российском и зарубежном литературоведении более чем за два века признания комедиографа ключевой фигурой в русской литературе XVIII в. Поставлена проблема целостности фонвизинского наследия в школьной и вузовской интерпретации; сделаны выводы о значении такого подхода для установления системных связей фонвизинских комедий с другими сохранившимися произведениями писателя, а также историко-литературным контекстом екатерининского времени. В центре доклада – проблема ценностных ориентиров творчества Д.И. Фонвизина. Впервые она была поднята в «Послании к слугам моим…» (нач. 1760–х гг.) и впоследствии развертывалась как в драматургии, так и в прозе, и публицистике писателя. Художественная философия Фонвизина развивается от осмысления духовного кризиса современников к открытию ценностей, на которые может опираться в построении своей личности человек: национальное самосознание, образование и воспитание, дом и семья, что в конечном итоге означает возможность внутренней независимости, обретение которой русским дворянством стало главной культурной задачей екатерининского времени.
۱۱۰۲۳.

Хронотоп в рассказах Л. Улицкой(مقاله علمی وزارت علوم)

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Анализируются особенности композиции малой прозы Л. Улицкой (на примере рассказов «Бронька», «Счастливые», «Бедные родственники»). Особое внимание уделяется особенностям изображения времени в рассказах, прошлому, которое для понимания мотивов и характеров героев Л. Улицкой оказывается порой важнее настоящего и даже будущего. Герои Л. Улицкой живут прошлым, ее проза пронизана ностальгической интонацией. Во многом это обусловлено вниманием автора к ценностях ушедшего мира, миру старой московской интеллигенции и новой советской, их сравнением и противопоставлением. Особенности хронотопа утверждают домашний интимный характер ее прозы, заключенной в рамки частной жизни отдельного человека (семьи). Традиционным для Л. Улицкой является прием ретроспективного изображения, позволяющий расширить границы художественного времени – пространства (из настоящего в прошлое). Временной поток в ее повествовании прерывист и неоднороден, характеризуется вниманием к ключевым событиям сюжета и временными лакунами относительно менее значительных, с точки зрения автора, событий. Интимная атмосфера внутреннего мира ее героев и ностальгические интонации их переживаний создают неповторимое своеобразие малой прозы Улицкой.
۱۱۰۳۲.

العنف الثوری والنفحه الجماهیریه الشعبیه فی شعر محمد مهدی الجواهری(مقاله علمی وزارت علوم)

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تناولت هذه الدراسه العنف الثوری والنفحه الجماهیریه الشعبیه فی شعر محمد مهدی الجواهری الذی عاش فی زمن مخاض الحوادث والتطورات السیاسیه التی مرت علی العراق بدء من ثوره العشرین وانتهاءً بحزب البعث، فالعنف الثوری فی شعر الجواهری یعود إلی الطبیعه المزاجیه العنیفه التی تمتاز بها شخصیه الجواهری . فعنف الجواهری لیس بالعنف الذی یوحی بالخشونه والحقد، فهو عنف تتطلبه ضروره الموقف والزمن وهو عنف قد جاء بمثابه رد فعل طبیعی لواقعٍ مر. إنَّ وظیفه الجواهری بالنسبه للجماهیر تکون مضاعفه فهو فضلاً عن اشتراکه مع الجماهیر فی ایجاد الحدث فإنه یری نفسه مسؤولاً عن حفظ ذلک الحدث بقصائده وأشعاره لذلک کانت أشعاره کالماء والهواء یتلقاها الناس بحراره وینشدونها حباً. وبحکم العلاقه الوطیده بین الجواهری وبقیه الجماهیر فالشعبیه کانت من مضامین شعر الجواهری ، فلا یغیب عن أی قضیه تحف الشعب دون أن یلتفت إلیها أو یشیر بها أو یدافع عنها. فالجواهری وإن کان مغترباً لم ینسی شعبه وهمومهم ومعاناتهم.
۱۱۰۳۳.

دراسه فی اللغات العربیه من قسم العقود المعینه فی القانون المدنی الإیرانی(مقاله علمی وزارت علوم)

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إنّ القوانین الایرانیه فقد اُخذت من الروح الاسلامی، واستخدام اللغه العربیه فی الحقوق الایرانی بات مکشوفاً. إنَّ الأساتذه والطلاب والباحثین فی فرع الحقوق لفهم القوانین وللإطلاع علی المفاهیم الحقوقیه مُرغمون علی الفهم الصحیح للغات العربیه الدارجه فی القوانین فی صعیدی اللغوی والمصطلح، القانون المدنی من القوانین الکثیره الأهمیه وقد استخدم فیه الکثیر من اللغات العربیه. الکاتب بصفته الحاصل علی ماجیستر فی هذا البحث مع العنایه لمنزله الرفیعه التی لدی فرع القانون الخاص فقد درس اللغات العربیه للقانون المدنی من القسم العقود المعیّنه وبما أنّه لا یُستطاع الدراسه الکامله والمبسّطه فی هذا البحث فقد بُیّنت أهمیتها علی شکل نبذه ومنتقی من هذه اللغات. فی خلال هذه الدراسه فقد حصل الکاتب علی نتائج منها: جهل المتلّقی علی جزء من اللغات من الجانب الصرفی والنحوی مما یؤدی للخطأ فی اللفظ والتشکیل الصحیح للمفرده العربیه، ومن المعلوم أنّ الطالبین لهذا العلم باستخدامهم للغات علی الطریقه الخاطئه من الجانب اللفظی والمعنوی والمصطلحی سیبقون بعیداً عن المفاهیم الصحیحه والمطلوبه.
۱۱۰۳۴.

الدراسه حول صوره الحب والوطن عند عبدالوهاب البیاتی وصلاح عبد الصبور(مقاله علمی وزارت علوم)

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الرومانسیه هی رده فعل علی الترکیز علی العقل ومیول إلی إبراز النفس الإنسانیه باتجاه الخیال والماضی التاریخی وکذلک الأراضی المجهوله. من أهم أصول هذا المکتب الحریه والاتجاه إلی الطبیعه، الأحاسیس والإثاره، والسفر التاریخی والجغرافیایی. إن عبدالوهاب البیاتی (1926- 1999) و صلاح عبدالصبور (1931- 1981). من أشهر وأقدر الشعراء العراقیین ومن الشعراء النجباء الرومانسیین وآثارهما یبرز فیها الوطن و العشق والإشتیاق (البعد عن الوطن والحب وذکریات الطفوله). إن هذه المؤلفات تبین الحزن والغم فی أشعار عبدالصبور و البیاتی وهذا البحث قائم علی عده فرضیات: 1. عبدالوهاب البیاتی و صلاح عبدالصبور یلتزمان بالرومانسیه المدنیه. 2. السفر الجغرافی والهرب من البیئه التی یتواجد فیها والشوق للوصول إلی وطنهما واضح فی آثارهما. الهدف من هذا البحث إیجاد طریقه استخدام أصول ومبانی مکتب الرومانسیه وبیان وجوه الاختلاف والتشابه فی آثار عبدالوهاب البیاتی و صلاح عبدالصبور باستخدام الأسلوب التحلیلی والتوصیفی لإثبات هذه الفرضیه.
۱۱۰۳۵.

دراسه آثار الواقعیه الإنتقادیه فی شعر مجید البرغوثی للمقاومه(مقاله علمی وزارت علوم)

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الواقعیه فی الحقیقه إستعراض الحیاه الحقیقیه للمجتمع البشری ومعالجه الحقائق والقضایا الموجوده فی المجتمع. فی العصر الحاضر یتطرق الکثیر من الشعراء والکتاب إلی خلق الأعمال الأدبیه فی مجال الواقعیه الإنتقادیه لأجل عدوان الصهیونی ونهب الدول العربیه الإسلامیه من قبل أعداء لدودین مثل الولایات المتحده والکیان الصهیونی الغاصب. وهذه القضیه ظهرت ظهورا رائعا فی الأدب العربی المعاصر بعد قضیه فلسطین وأثرت علی الشعراء المعاصره بشکل ملحوظ. مجید البرغوثی (1947م) من هذه الشعراء المعاصره الفلسطینیه الذی تعرّف علی الثقافه واللغه الغربیه وللواقعیه الإنتقادیه آثار بارزه فی أشعاره. نحن فی هذا البحث نرید أن ندرس آثار الواقعیه الإنتقادیه- الإجتماعیه وتحلیل المقاومه ومکافحه الظلم فی أشعار هذا الشاعر الفلسطینی عن طریق المنهج الوصفی- التحلیلی. والنتیجه تحکی بأن الشاعر قد تطرّق إلی دراسه عوامل مثل الإنتقاد عن إیدیولوجیات الغرب السیاسیه والصدمه الإقتصادیه وفقر فلسطین ومعاناه النازحین والسجناء وقضیه الفلسطینیین وحقوقهم ومنزله النساء وتعظیم القاده الدینیه و... بأسلوب واقعی فی المستویات السیاسیه والتاریخیه والإجتماعیه والثقافیه.
۱۱۰۳۶.

الکنایات المصریه العامیه من منظور تداولیه اللغه(مقاله علمی وزارت علوم)

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إن تداولیه اللغه إحدی مجالات الألسنیات وهی تعالج أثر السیاق علی الدلاله. إنما یقصد بالسیاق فی هذا المجال اللغوی، الفضاء الخارجی لنظام اللغه والذی ینقسم إلی سیاقین غیر لغوی ولغوی. أما الکنایه، کنوع خاص للغه، فهی تعتبر نوعیه موقفیه خاصه. وقد یکون دراسه وتحلیل سیاقها وفقاً لتداولیه اللغه وهی التی تعنی بالمجالات اللغویه خارجاً من نظام اللغه، فهی تسعی إلی فهم الطریقه التوظیفیه للغه. قامت هذه الدارسه بتحلیل ودراسه الکنایه المصریه، کلغه عامیه بالمنهج التحلیلی- الوصفی. أدلت نتائج هذه الدراسه: 1- أن الکنایه کونها نوعاً لغویاً تُدرَس فی فضاء خارج من النظام اللغوی وبالنظر للموقف المسیطر علی مستخدمی اللغه وفی إطار الدلاله غیر اللغویه. 2- نظریه لویس والتی تعدّ السیاق اللغوی من مواصفات السیاق غیر اللغوی، رفضت من وجهه نظر هذه الدراسه. 3- قد تکون أهم المواصفات الفریده للکنایه المصریه، البساطه فی اللفظ وتأثرها الحاد من الثقافات الأخری، وکونها صوریه وتقلیداً جمّاً من الانفعالات الاجتماعیه.   
۱۱۰۳۷.

مطابقه أسس ومکونات سیره الإمام علی(ع) لمبادئ النظام الدیمقراطی(مقاله علمی وزارت علوم)

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موضوع المقاله التی بین أیدینا تطابق مبادئ سیره أمیر المؤمنین علی(ع) مع مبادئ النظام الدیمقراطی. إن المنزله الرفیعه للدیمقراطیه لا تخفی علی عاقل و لکن منذ أکثر من ثلاثه عشر قرن مضت وفی مجتمع مثل المملکه العربیه التی کانت تنتقل لتوّها من الجاهلیه نحو الحضاره، فإن عرض رؤیه وسلوک یدلّان علی مجتمع وحکومه دیمقراطیه فهو أمر یستحق التأمل. إن هذه الدراسه بالإعتماد علی المنهج الوصفی- التحلیلی هدفت إلی تطبیق نهج الإمام(ع) فی الفعل والقول فی عصر الخلفاء وخاصه أثناء خلافته مع نهج الأنظمه الدیمقراطیه. إنّ البحث والتحقیق فی سیره الإمام علی(ع) وفحص مختلف جوانب سلوکه بعد رحیل النبی محمد(ص) یُظهر أنّ سلوکه یتّسق مع ما یسمی الیوم بالنظام الدیمقراطی وعلیه یمکن اعتبار الإمام(ع) شخص دیمقراطی. شخصٌ علی الرغم من وجود نصوص من الآیات القرآنیه الکثیره والروایات العدیده الدّاله علی خلافته للرسول الأکرم(ص) وجدارته بها حُرم من حقه الطبیعی ومع ذلک وحفاظاً علی الدین الإسلامی وحمایه حیاه المسلمین؛ لم یکتفِ فقط بقبول رأی الناس واختیاره الصمت لمده ربع قرن، بل قدّم مشورته للخلفاء وکان مثالاً للدیمقراطیه خلال فتره حکومته.
۱۱۰۳۸.

أحمد شوقی شاعر الإسلام(مقاله علمی وزارت علوم)

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یتجاوب شوقی مع المعانی الاسلامیه السامیه التی تجیش بها قلوب المسلمین نحو خاتم المرسلین فلا تفوته مناسبه إلا یذکر فیها سیرته(ص) مشیدا بفضائله الکریمه وشمائله الرفیعه، متضرعا ملتمسا شفاعته(ص) مستشفیا به لتفریج کروب الأمه الاسلامیه وموجها لها لتتخذ منه القدوه والاسوه حتی تستعید مجدها و تسترجعها فیها المجید. فإن شعره المجسد للعقیده الاسلامیه ومعرفه الدقیقه للدین الاسلامی یلقی لنا الضوء علی حقیقه عقیده الشاعر، ونحن إذا دققنا النظر فی شعر أحمد شوقی لا نجد فیه شیئاً یشیر إلی مروقه بل ولاء تام للاسلام والمسلمین؛ و له فی أشعاره الاسلامیه ثلاث قصائد فی مدح النبی هی «النهج البرده» و«الهمزه النبویه» وأما الثالثه فهی «ذکری المولد» تبیّن اعتزاز شوقی الشدید بإسلامه فی حیاته وأیضا فی شعره، وهذه القصائد خیر بیان علی مدی وعی شوقی بدور الاسلام فی حیاته، ونحن بصدد علی دراستها التحلیلیه فی هذه المقاله.
۱۱۰۳۹.

بررسی هنجارگریزی در اشعار معین بسیسو و محمدرضا شفیعی کدکنی(مقاله علمی وزارت علوم)

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هنجارگریزی از نظریه های ادبی جدید است که در آن شاعر با بکارگیری اسلوب های خاص، ساختار متداول زبان را بر هم زده، و زبانی ناآشنا می آفریند. هم زمان با نشر جریان نوگرایی در شعر، شاعران معاصر فارس و عرب به نوگرایی در مفاهیم و زبان شعری خود روی آوردند. بسیسو (1926-1984م)، و شفیعی کدکنی (1318ش) از شاعرانی هستند که با گریز از هنجارهای زبان معیار، بعد زیباشناختی و تأثیرگذاری اشعار خود را وسعت بخشیده اند. هدف این پژوهش بررسی مؤلفه های هنجارگریزی در شعر دو شاعر است تا نشان دهد که شاعران مذکور در القای مفاهیم مورد نظر خود، چگونه و با چه هدفی از این شگرد ادبی بهره جسته اند؟ دستاورد پژوهش نشان داد که بسیسو و کدکنی با گریز از هنجارهای رایج سبک نحوی، واژگانی و ...، نه تنها بر صلابت شعر خود افزوده اند بلکه با خلق صورت معنایی جدید، توان القای مفاهیم مورد نظر خود را وسعت بخشیده اند.
۱۱۰۴۰.

بررسی تطبیقی جلوه های آسمان و اجرام آسمانی در شعر بحتری و خاقانی(مقاله علمی وزارت علوم)

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آسمان و اجرام وابسته به آن مانند ماه، خورشید و ستارگان از دیرباز جلوه های گوناگون و تعیین کننده معنایی و تصویری در شعر کهن و معاصر فارسی و عربی داشته اند. بررسی این جلوه ها نقش مهمی در ورود به دنیای ذهنی شاعران و شناختن اندیشه ها و عواطف آنان دارد؛ ضمن اینکه، خواننده را با شگردها و ظرایف بلاغی به کار گرفته شده توسط هر شاعر بیش تر آشنا می سازد. بر این اساس و با توجه به همین اهمیت، پژوهش حاضر بر آن است با استفاده از شیوه توصیفی- تحلیلی، بارزترین کارکردهای معنایی و تصویری آسمان و اجرام مربوط به آن را در اشعار دو شاعر بزرگ کلاسیک بررسی کند و به پُر نمودترین شباهت ها و تفاوت های شعر آن ها از این منظر بپردازد. یکی از این دو شاعر، بحتری شاعر پرآوازه عرب در قرن سوم و دیگری خاقانی شروانی ، شاعر برجسته قرن ششم در ایران می باشد. این دو شاعر توجهی بارز وتعیین کننده به آسمان، خورشید، ماه و ستارگان داشته اند و تصاویری که از این عناصر مربوط به طبیعت ساخته اند، سزاوار بررسی است.

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